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Saturday, 9 October 2010

इश्क़ का मंदिर

ख़ुदगरज़ तेरी मुहब्बत की हवा है,
रोज़ जिसको छत बदलने में मज़ा है।

सैकड़ों मशगूल हैं सजदे में तेरे,
तू जवानी के मजारों की ख़ुदा है।

मैं पुजारी ,इश्क़ के मंदिर का तेरा,
देवी दर्शन पर मुझे मिल ना सका है।

आंधियों के क़त्ल का ऐलान है अब,
सर, चराग़ों की जमानत ले चुका है।

दिल के भीतर सैकड़ों दीवारें हैं अब,
रिश्तों का बाज़ार पैसों पर टिका है।

है ज़रूरी पैसा जीने के लिये पर,
इश्क़ का गुल्लक भरोसों से भरा है।

तुम भी तडफ़ोगी वफ़ा पाने किसी की,
एक हुस्ने-बेवफ़ा को बद्दुआ है।

सच्चा आशिक़ सब्र के सागर में रहता,
तू किनारों के हवस में मुब्तिला है।

आगे राहे-इश्क़ में बढना तभी ,गर
दानी कुरबानी का दिल में हौसला है।